गढ़वा: अभिषेक भारद्वाज के 5 दिन के आंदोलन के आगे झुका प्रशासन, आज से साफ होगी सरस्वती नदी

झारखंड के गढ़वा जिले में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर मानी जाने वाली सरस्वती नदी के पुनरुद्धार को लेकर आखिरकार स्थानीय प्रशासन को कदम बढ़ाना ही पड़ा। सामाजिक कार्यकर्ता अभिषेक भारद्वाज के नेतृत्व में पिछले 5 दिनों से चलाए जा रहे कड़े आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन का बड़ा असर देखने को मिला है। चौतरफा दबाव के बीच जिला प्रशासन ने आज से ही सरस्वती नदी की साफ-सफाई और इसके कायाकल्प का कार्य युद्धस्तर पर प्रारंभ कर दिया है। इसे आंदोलनकारी युवाओं और शहरवासियों की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।
कभी जीवनदायिनी थी सरस्वती नदी, आज बन गई जहरीली धारा
एक समय था जब गढ़वा शहर के बिल्कुल बीचों-बीच प्रवाहित होने वाली सरस्वती नदी यहां के निवासियों के लिए जीवन का मुख्य आधार और जल का सबसे बड़ा स्रोत हुआ करती थी। इस नदी का जुड़ाव गढ़वा की प्राचीन पहचान और स्थानीय संस्कृति से रहा है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में भारी लापरवाही, लगातार हुए अवैध अतिक्रमण, शहरी सीवरेज के गंदे पानी और बेतरतीब ढंग से फेंके गए कूड़े-कचरे की वजह से यह पवित्र नदी एक बदबूदार और दूषित नाले के रूप में तब्दील हो गई। वर्तमान समय में हालात इतने नारकीय हो चुके हैं कि नदी के तटीय इलाकों के समीप खड़े होना या सांस लेना भी बेहद दुश्वार हो गया है। नदी का समूचा क्षेत्र प्लास्टिक, घरेलू अपशिष्ट और भारी गंदगी की चपेट में आ चुका है।
25 वर्षों में सिर्फ मिला आश्वासन
स्थानीय लोगों का कहना है कि करीब ढाई दशक पहले तक सरस्वती नदी अपनी अविरल धारा और सुंदरता के लिए गढ़वा की शान मानी जाती थी। लेकिन पिछले 25 वर्षों के लंबे अंतराल में कई जनप्रतिनिधि आए और गए, विधायक से लेकर मंत्री तक बदले और प्रशासनिक अमला भी बदला, मगर नदी के संरक्षण के नाम पर केवल खोखले आश्वासन ही नसीब हुए। चुनावी घोषणापत्रों में तो नदी की सफाई के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन धरातल पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। प्रशासन की इसी निष्क्रियता के खिलाफ अभिषेक भारद्वाज ने 5 दिनों के अनवरत आंदोलन का बिगुल फूंका, जिसने अधिकारियों को तुरंत एक्शन मोड में आने पर विवश कर दिया।
कई लोग सरस्वती नदी को अपना निजी डस्टबिन समझ बैठे हैं

नदी की इस दुर्दशा के लिए केवल राजनेता या सरकारी महकमा ही दोषी नहीं है, बल्कि समाज के लोग भी कहीं न कहीं इसके लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। शहर के ही कई बाशिंदों ने इस ऐतिहासिक नदी को अपना व्यक्तिगत डस्टबिन (कूड़ादान) मान लिया है। घरों से निकलने वाला हर प्रकार का कचरा, रासायनिक वर्ज्य और प्लास्टिक थैलियां बेझिझक इस नदी में प्रवाहित की जा रही हैं। विडंबना यह है कि लोग अपनी निजी संपत्तियों और घरों को तो साफ-सुथरा रखते हैं, परंतु सार्वजनिक संपदा और प्रकृति को मलबे से पाट रहे हैं। जागरूक नागरिकों का मानना है कि ऐसे गैर-जिम्मेदार तत्वों को चिन्हित कर उन पर दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए, अन्यथा आने वाली पीढ़ियां इस पावन नदी को सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही देख पाएंगी।
दो नदियों पर संकट
गौरतलब है कि गढ़वा शहर की भौगोलिक संरचना के बीच से दानरो और सरस्वती जैसी दो बेहद महत्वपूर्ण नदियां बहती हैं। ये दोनों जलधाराएं कभी इस पूरे इलाके की लाइफलाइन और पहचान थीं। लेकिन विडंबना देखिए कि आज दोनों ही नदियों का वजूद लगभग एक जैसे संकट से घिर चुका है। अनियंत्रित अतिक्रमण, प्रशासनिक उपेक्षा और नागरिकों की लापरवाही के कारण दोनों नदियां अपना अस्तित्व खोने की कगार पर हैं। बहरहाल, सरस्वती नदी पर शुरू हुए इस ताजा सफाई अभियान से पर्यावरणविदों और आम जनता में यह उम्मीद जगी है कि अब दानरो नदी के दिन भी फिरेंगे और दोनों नदियों को अपना पुराना स्वरूप वापस मिल सकेगा।
