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October 26, 2026

Suryoday Samvaad

Nayi Soch Nayi Disha

जमशेदपुर में अनोखी गोलू पूजा: सात सीढ़ियों पर सजी गुड़ियों की मनमोहक दुनिया

जमशेदपुर में दुर्गा पूजा का एक बेहद अनूठा और अलग रूप देखने को मिला है, जहाँ सोनारी के एक घर में दक्षिण भारत की प्रसिद्ध गोलू पूजा के तहत सात सीढ़ियों पर देवी-देवताओं और विभिन्न प्रसंगों की गुड़ियों को बेहद खूबसूरती से सजाया गया है। आइए जानते हैं इस पारंपरिक और सांस्कृतिक उत्सव के बारे में।

जमशेदपुर: सोनारी के एक घर में सजी गुड़ियों की अद्भुत दुनिया

दुर्गा पूजा के दिनों में अमूमन बड़े पंडालों और आकर्षक मूर्तियों की चर्चा होती है, लेकिन जमशेदपुर के सोनारी स्थित एक अपार्टमेंट में पूजा का एक अलग और सुंदर नजारा देखने को मिला है। यहाँ रहने वाले दिलीप और सुधा के घर में मां दुर्गा की आराधना के साथ-साथ दक्षिण भारत की प्रसिद्ध पारंपरिक गुड़िया पूजा यानी ‘गोलू पूजा’ की अनूठी झलक देखने को मिल रही है। घर के अंदर सात सीढ़ियों पर करीने से सजाई गई विभिन्न प्रकार की गुड़ियां न सिर्फ घर की सुंदरता में चार चांद लगा रही हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपराओं और गहरी धार्मिक आस्था को भी बखूबी दर्शा रही हैं।

सात सीढ़ियां, अनगिनत गुड़ियां और हर रचना की अपनी कहानी

दिलीप और सुधा के आवास पर गोलू पूजा के लिए सात चरणों (सीढ़ियों) वाला एक विशेष मंच तैयार किया गया है। इन सीढ़ियों पर अलग-अलग कलाकृतियों और डिजाइनों वाली सुंदर गुड़ियों को करीने से व्यवस्थित किया गया है। इन गुड़ियों में मुख्य रूप से हिंदू पौराणिक मान्यताओं से जुड़े देवी-देवताओं के स्वरूप देखने को मिलते हैं। इस सजावट की सबसे खास बात यह है कि हर एक गुड़िया अपने भीतर एक अनोखा संदेश और प्रसंग समेटे हुए है। पूरी सजावट को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानो भारतीय संस्कृति और लोककथाओं की एक जीवंत लघु-दुनिया घर के भीतर ही उतर आई हो।

दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परंपरा को जमशेदपुर में जीवंत रखना

गोलू पूजा मुख्य रूप से दक्षिण भारत की एक बहुत ही लोकप्रिय सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा है। नवरात्र के पवित्र दिनों में घरों के भीतर सीढ़ीनुमा ढांचा बनाकर उस पर देवी-देवताओं और विभिन्न सांस्कृतिक दृश्यों को दर्शाती गुड़ियों को स्थापित किया जाता है। सोनारी निवासी दंपत्ति ने इसी समृद्ध परंपरा को जमशेदपुर में सहेज कर एक बेहतरीन मिसाल पेश की है। यह इस बात का प्रमाण है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में त्योहार मनाने के तरीके भले ही भिन्न हों, लेकिन उन सबकी मूल भावना आस्था, संस्कृति और परंपरा के प्रति सम्मान पर टिकी होती है।

गुड़ियों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंच रही संस्कृति की अनमोल विरासत

गोलू पूजा का यह आयोजन केवल सजावट या कला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे अपनी प्राचीन मान्यताओं, लोककथाओं और सांस्कृतिक धरोहर को आने वाली युवा पीढ़ी तक पहुँचाने का मुख्य उद्देश्य भी छिपा होता है। इन सुंदर गुड़ियों के माध्यम से बच्चों को पौराणिक कथाओं, देवी-देवताओं के स्वरूपों और भारतीय संस्कृति से जोड़ा जाता है। सोनारी में सजी गुड़ियों की यह अनूठी दुनिया सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की एक सुंदर तस्वीर पेश कर रही है।

क्या है गोलू पूजा की परंपरा, क्यों सजाई जाती हैं सीढ़ियों पर गुड़ियां?

दक्षिण भारत में नवरात्र के पावन पर्व का एक अभिन्न हिस्सा ‘गोलू पूजा’ है। इसे तमिलनाडु में ‘बोम्मई गोलू’, कर्नाटक में ‘बोम्बे हब्बा’ तथा आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में ‘बोम्माला कोलुवु’ के नाम से भी जाना जाता है। इस पारंपरिक उत्सव के दौरान घरों के अंदर सीढ़ीनुमा मंच बनाकर मिट्टी, लकड़ी, कागज और अन्य सामग्रियों से बनी अनगिनत गुड़ियों को सजाया जाता है।

  • विषम संख्या में सीढ़ियों का महत्व: गोलू पूजा में सामान्य तौर पर तीन, पांच, सात, नौ या ग्यारह सीढ़ियों पर गुड़ियों को सजाने का नियम है, हालांकि सीढ़ियों की संख्या घर की परंपरा और उपलब्ध जगह पर भी निर्भर करती है।
  • देवी-देवताओं से लेकर लोकजीवन की झलक: इन सीढ़ियों पर मां दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, भगवान गणेश के अलावा विभिन्न पौराणिक कथाओं, पारंपरिक विवाह समारोहों, लोकनृत्य और ग्रामीण जीवन शैली को प्रदर्शित करने वाली गुड़ियों को विशेष रूप से रखा जाता है।

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