रांची: मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे कोयरीबेड़ा के ग्रामीण, भीषण गर्मी में पानी-सड़क और बिजली का बड़ा संकट

Ranchi Koiribeda Villagers Crisis: झारखंड की राजधानी रांची से महज 20 किलोमीटर और प्रखंड मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हाहाप पंचायत का कोयरीबेड़ा गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है। यह गांव राज्य सरकार के विकास और दावों की जमीनी हकीकत बयां करता है। देश की आजादी के दशकों बाद भी यहां के लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
वर्तमान में आसमान से बरसती आग और 41 डिग्री के पार पहुंचे पारे ने ग्रामीणों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। गांव में न तो पीने के साफ पानी की व्यवस्था है और न ही दैनिक कार्यों के लिए जल की उपलब्धता। यहां के लोगों की सुबह उठते ही पानी के इंतजाम के लिए भागदौड़ शुरू हो जाती है। सिर पर बाल्टी और बर्तन लेकर पगडंडियों से होते हुए पानी लाना यहां की नियति बन चुका है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पानी जैसी हर जरूरी सुविधा का इस गांव में घोर अभाव है। कोयरीबेड़ा के विभिन्न टोलों को मिलाकर यहां करीब 100 घरों में 500 से अधिक की आबादी निवास करती है। सरकारी स्तर पर यहां तीन और सीसीएल (CCL) द्वारा एक जलमीनार लगाई गई थी, साथ ही करीब आधा दर्जन हैंडपंप भी गाड़े गए थे, लेकिन देखरेख के अभाव में ये सभी खराब पड़े हैं। स्थिति यह है कि पूरी आबादी पीने के पानी के लिए कुएंनुमा चुआं पर और नहाने-धोने के लिए एक किलोमीटर दूर स्थित नदी व दाड़ी (डोभा) के दूषित जल पर निर्भर है। इसी दाड़ी से ग्रामीण भी पानी लेते हैं और मवेशी भी प्यास बुझाते हैं।
सड़क की स्थिति भी बेहद बदतर
सड़क संपर्क के मामले में भी कोयरीबेड़ा गांव अलग-थलग पड़ा हुआ है। हाहाप के सरवल से कोयरीबेड़ा होते हुए रुडुंगकोचा, बुंडू बेड़ा, बुतियो, नचलदाग और तुंजू को जोड़ने वाली मुख्य संपर्क सड़क पूरी तरह जर्जर हो चुकी है, जिससे आए दिन हादसे की आशंका बनी रहती है। करीब दो साल पहले चुनाव से ठीक पहले स्थानीय विधायक ने सरवल में इस सड़क की मरम्मत के लिए शिलान्यास किया था, मगर आज तक काम शुरू नहीं हो सका। प्रशासनिक उपेक्षा से नाराज ग्रामीणों ने शिलान्यास का शिलापट्ट भी तोड़ दिया है। गांव के बारू टोली की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है, जहां न तो एक भी हैंडपंप है और न ही सड़क बनी है। रास्ता साफ न होने के कारण गांव तक एंबुलेंस या कोई गाड़ी नहीं पहुंच पाती। ऐसे में यदि कोई बीमार पड़ जाए, तो ग्रामीण मरीज को खटिया पर लादकर मुख्य सड़क तक पहुंचाने को मजबूर हैं।
24 घंटे में महज 4 से 5 घंटे ही रहती है बिजली
पानी और सड़क की बदहाली के बीच बिजली की आंख-मिचौली ने ग्रामीणों का जीना मुहाल कर रखा है। हालांकि मुख्यमंत्री की ओर से ग्रामीण इलाकों में कम से कम 12 से 15 घंटे निर्बाध बिजली देने के कड़े निर्देश हैं, लेकिन कोयरीबेड़ा गांव में रोजाना बमुश्किल 4 से 5 घंटे ही बिजली की दर्शन होते हैं। ग्रामीण इलाकों में हल्की सी आंधी या खराब मौसम होते ही बिजली काट दी जाती है, जिसके बाद घंटों या दिनों तक आपूर्ति ठप रहती है।
चुनावी बूथ पर भी बुनियादी सुविधाएं नदारद
गांव की इस बदहाली का असर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर भी दिखता है। लोकसभा, विधानसभा या पंचायत चुनाव के वक्त गांव के ही नव प्राथमिक विद्यालय को मतदान केंद्र (बूथ संख्या 254) बनाया जाता है। हैरानी की बात यह है कि इस सरकारी मतदान केंद्र पर भी सड़क, बिजली या पानी की कोई स्थाई व्यवस्था मौजूद नहीं है। चुनाव के दौरान प्रशासन केवल अस्थाई और वैकल्पिक इंतजाम करके काम चला लेता है, जिसके बाद स्थिति जस की तस हो जाती है।
क्या कहते हैं पंचायत के मुखिया?
इस पूरी अव्यवस्था पर हाहाप पंचायत के मुखिया नाने कच्छप उर्फ नन्हे कच्छप का कहना है कि पंचायत स्तर पर मुखिया के अधिकार और फंड काफी सीमित होते हैं, जिससे वे चाहकर भी बड़े स्तर पर काम नहीं करा सकते। उन्होंने बताया कि पूरे पंचायत क्षेत्र के अंतर्गत जितने भी हैंडपंप और जलमीनार खराब स्थिति में हैं, उनकी एक विस्तृत सूची तैयार कर पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के साथ-साथ प्रखंड कार्यालय को सौंप दी गई है। इस संबंध में अधिकारियों को कई बार फोन के माध्यम से भी सूचित किया गया, लेकिन अभी तक मरम्मत का कार्य शुरू नहीं कराया जा सका है।


